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बिहार में शराबबंदी के बीच चौंकाने वाला सच: NFHS 2024-25 रिपोर्ट में पुरुषों में शराब सेवन बढ़ा, तंबाकू में आई गिरावट

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NFHS 2024-25 रिपोर्ट में सामने आया है कि बिहार में शराबबंदी लागू होने के बावजूद पुरुषों में शराब सेवन बढ़ा है, जबकि तंबाकू उपयोग में कमी दर्ज की गई है। स्वास्थ्य और सामाजिक व्यवहार में यह बड़ा बदलाव चौंकाने वाला है।

पटना/आलम की खबर:पटना/आलम की खबर: बिहार में लंबे समय से लागू शराबबंदी कानून को लेकर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS) 2024-25 की ताजा रिपोर्ट ने राज्य में सामाजिक और स्वास्थ्य व्यवहार को लेकर चौंकाने वाला खुलासा किया है। रिपोर्ट के अनुसार, जहां एक ओर तंबाकू सेवन करने वालों की संख्या में कमी दर्ज की गई है, वहीं दूसरी ओर पुरुषों में शराब सेवन की दर बढ़ती नजर आ रही है। यह स्थिति उस समय और अधिक गंभीर हो जाती है जब राज्य में पूर्ण शराबबंदी कानून लागू है और इसके सख्त क्रियान्वयन के दावे लगातार सरकार की ओर से किए जाते रहे हैं।

रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि बिहार में स्वास्थ्य संबंधी व्यवहार में धीरे-धीरे बदलाव तो आ रहा है, लेकिन यह बदलाव एक समान दिशा में नहीं है। तंबाकू सेवन में गिरावट को स्वास्थ्य जागरूकता अभियानों की सफलता माना जा रहा है, लेकिन शराब सेवन में बढ़ोतरी कई नई सामाजिक और प्रशासनिक चुनौतियों की ओर इशारा कर रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रवृत्ति केवल कानून की प्रभावशीलता पर ही नहीं, बल्कि समाज के भीतर बदलते व्यवहार और अवैध आपूर्ति तंत्र की मजबूती पर भी सवाल उठाती है।

राज्य में शराबबंदी लागू होने के बाद से लगातार यह बहस चलती रही है कि क्या यह नीति वास्तव में अपने उद्देश्य को पूरा कर पा रही है या नहीं। NFHS की यह रिपोर्ट इस बहस को और तेज कर देती है। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में किए गए सर्वे में यह देखा गया कि कुछ वर्गों में शराब की उपलब्धता अप्रत्यक्ष रूप से बनी हुई है, जिससे इसके सेवन पर पूरी तरह रोक नहीं लग पा रही है।

विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि शराबबंदी के बावजूद अवैध शराब का बाजार कई जगहों पर सक्रिय है, जो न केवल स्वास्थ्य के लिए खतरा है बल्कि सामाजिक सुरक्षा के लिए भी गंभीर चुनौती है। इसके साथ ही यह भी संकेत मिलता है कि केवल कानूनी प्रतिबंध किसी व्यवहार को पूरी तरह समाप्त करने के लिए पर्याप्त नहीं होते, जब तक कि उसके साथ व्यापक सामाजिक और स्वास्थ्य जागरूकता अभियान न चलाए जाएं।

वहीं दूसरी ओर तंबाकू सेवन में आई कमी को एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग और विभिन्न गैर-सरकारी संगठनों द्वारा चलाए गए जागरूकता अभियानों का असर इस गिरावट में साफ दिखाई देता है। स्कूलों, पंचायतों और सामुदायिक स्तर पर किए गए प्रयासों ने लोगों में स्वास्थ्य के प्रति समझ को बढ़ाया है।

हालांकि, रिपोर्ट का सबसे बड़ा निष्कर्ष यही है कि बिहार में स्वास्थ्य व्यवहार एक संक्रमणकालीन दौर से गुजर रहा है। एक तरफ कुछ बुरी आदतों में कमी आ रही है, तो दूसरी तरफ कुछ नए या पुराने व्यवहार फिर से उभर रहे हैं। यह स्थिति नीति निर्माताओं के लिए एक बड़ी चुनौती पेश करती है।

सरकार के लिए यह रिपोर्ट इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सीधे तौर पर राज्य की प्रमुख नीति शराबबंदी के प्रभाव पर सवाल उठाती है। अब यह चर्चा और तेज हो गई है कि क्या नीति में किसी प्रकार के संशोधन, सख्त निगरानी या नए सामाजिक हस्तक्षेप की आवश्यकता है।

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